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आप दिल्ली में क्यों हारी, चुनौती क्या हैं अब और आगे करना क्या चाहिए?

  • आप दिल्ली में क्यों हारी, चुनौती क्या हैं अब और आगे करना क्या चाहिए?

नई दिल्ली-26-04-17 : दिल्ली नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी की हार तो तय थी लेकिन इतनी बुरी हार की कल्पना तो शायद उनके नेताओं ने भी नहीं की होगी. बीजेपी के मुकाबले आप एक चौथाई सीटें ही हासिल कर पाई. कांग्रेस उसे कड़ी टक्कर दे गयी. आप के लिए सबसे ज्यादा कष्टकारी बात यह है कि उसका वोट प्रतिशत पिछले विधान सभा चुनाव के मुकाबले करीब करीब आधा ही रह गया है. तब उसके हिस्से में 53 -54 फीसद वोट आया था लेकिन अब उसके हिस्से में 25-25 फीसद ही आ रहा है.

आप को क्या करना चाहिए?

इतनी करारी हार के बाद आम आदमी पार्टी को जनादेश का सम्मान करना चाहिए था. मुख्यमंत्री केजरीवाल को जनता से उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरने के लिए माफी मांगनी चाहिए थी. बीजेपी को बधाई देना चाहिए थी. मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने का वायदा करना चाहिए था. अपनी सरकार को जनता के द्वार पर ले जाने का आश्वासन देना चाहिए था. मंत्रीमंडल में फेरबदल करने के संकेत देने चाहिए थे. विधायक दल की बैठक बुलाकर सबको कसने की बात करनी चाहिए थी. पार्टी के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन बुलाने और उनकी राय लेने की घोषणा करनी चाहिए थी. आत्मचिंतन जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए था. इसके साथ ही अपनी उपलब्धियों को गिनाना चाहिए था. बताना चाहिए था कि मोहल्ला क्लिनिक खोले हैं, सरकारी स्कूलों की हालत सुधारी है, तीन सौ बस्तियों में पानी पहुंचाया है और ऐसे काम आगे भी करते रहेंगे.

लेकिन ‘आप’ का तर्क

पार्टी प्रवक्ता आशुतोष लगातार कहते रहे कि तीनों नगर निगमों में बीजेपी के दस साल के शासन के दौरान कोई काम नहीं हुआ , जमकर भ्रष्टाचार हुआ, चोरी चकारी की गयी. इसके बाद उनकी हैरानी सामने आई. उनका कहना था कि ऐसी भ्रष्ट पार्टी को आखिर कैसे लोग वोट दे सकते हैं.

आशुतोष हो सकता है कि ठीक कह रहे हों कि दिल्ली वालों ने दस साल भ्रष्ट नगर निगमों को झेला लेकिन फिर सवाल उठता है कि यह बातें जनता को समझाने में कामयाब क्यों नहीं हुई. सवाल उठता है कि जनता ने फिर भी आप पर विश्वास क्यों नहीं किया. सवाल उठता है कि दस साल के कथित भ्रष्ट तंत्र को क्यों दिल्ली के वोटरों ने पांच और सालों का मौका दे दिया.

केजरीवाल की दिक्कत क्या है?

केजरीवाल की दिक्कत यह है कि वह बहुत जल्दबाजी में हैं. उनकी रणनीति जल्दी से जल्दी राष्ट्रीय पार्टी बनने की है. वह दिल्ली , पंजाब और गोवा में छह फीसद से ज्यादा वोट हासिल कर चुकी है. उसे एक अन्य राज्य में छह फीसद वोट हासिल करने है ( हो सकता है इस साल गुजरात में होने वाले चुनावों में वह ऐसा करने में कामयाब हो जाए ) . ऐसा होने पर उसे राष्ट्रीय दल का दर्जा मिल जाएगा क्यों कि चार लोकसभा सीटें उसके पास पहले से ही है. चुनाव आयोग के एक नियम के तहत उसे राष्ट्रीय दल घोषित किया जा सकता है. लेकिन केजरीवाल को दिल्ली के अपने गढ़ को मजबूत करना चाहिए थी

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